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बीकानेर स्थापना दिवस: पुष्प रंगोलियों से महके 11 मंदिर, आस्था और कला का दिखा अद्भुत संगम

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Name:-DIVYA MOHAN MEHRA
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बीकानेर -  शनिवार की सुबह जब बीकानेर के ऐतिहासिक परकोटे की लाल पत्थरों वाली दीवारों पर सूरज की पहली किरण पड़ी, तो यह केवल एक शहर की वर्षगांठ नहीं थी; यह एक उत्सव का खिलना था। ज़िला स्थापना दिवस के अवसर पर, शहर के आध्यात्मिक परिदृश्य को जीवंत रंगों और सुगंधित वैभव के कैनवास में बदल दिया गया।

देवस्थान विभाग द्वारा शुरू की गई एक अनूठी पहल के तहत, बीकानेर के 11 सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों को जटिल "पुष्प रंगोलियों" से सजाया गया। यह आयोजन पारंपरिक उत्सवों से हटकर भक्ति के एक अधिक टिकाऊ, कलात्मक और गहरे स्वरूप की ओर एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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आस्था और रचनात्मकता का अनूठा संगम

धार्मिक उत्साह को रचनात्मक अभिव्यक्ति के साथ जोड़ने के उद्देश्य से शुरू की गई इस पहल में 51 प्रशिक्षित प्रतिभागियों और स्वयंसेवकों ने भाग लिया। देवस्थान विभाग के सहायक निदेशक श्री गौरव सोनी के अनुसार, मंदिरों का चयन रणनीतिक था, जिसमें भीतरी शहर के प्राचीन मंदिरों से लेकर बाहरी इलाकों के प्रसिद्ध तीर्थों को शामिल किया गया।

इस 'पुष्प पथ' में ये मंदिर मुख्य आकर्षण रहे:

रसिक शिरोमणि मंदिर और राज रतन बिहारीजी मंदिर, जहाँ फूलों के पैटर्न में राजस्थानी वास्तुकला की झलक दिखी।

ऐतिहासिक लक्ष्मीनाथ जी मंदिर, जो बीकानेर का सबसे पुराना मंदिर है, यहाँ श्रद्धालुओं का सबसे बड़ा सैलाब उमड़ा।

ललेश्वर महादेव (शिवबाड़ी) और सुरसागर स्थित करणी माता मंदिर, जहाँ पानी में पुष्प कला के प्रतिबिंब ने एक जादुई दृश्य उत्पन्न किया।

श्री सोनी ने बताया, "यह केवल सजावट नहीं थी, यह एक अर्पण था। फूलों के माध्यम से हमने पत्थर की स्थिर सुंदरता को प्रकृति की जीवंत और क्षणभंगुर सुंदरता के साथ जोड़ने का प्रयास किया है।"


कार्यशाला से मंदिर के फर्श तक: एक रचनात्मक यात्रा

इन मनमोहक दृश्यों के पीछे इस सप्ताह की शुरुआत में आयोजित एक गहन 'पुष्प रंगोली कार्यशाला' की मेहनत थी। कार्यक्रम समन्वयक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता श्रीमती ज्योति स्वामी ने जोर देकर कहा कि 51 प्रतिभागी - जिनमें मुख्य रूप से बालिकाएं और महिलाएं थीं - केवल सजावट करने वाली कलाकार नहीं बल्कि "सांस्कृतिक राजदूत" थीं।

श्रीमती ज्योति स्वामी ने बताया, "प्रतिभागियों ने अपने प्रशिक्षण के दौरान सीखी गई तकनीकों का उपयोग करके ऐसे डिज़ाइन तैयार किए जो गणितीय रूप से सटीक और आध्यात्मिक रूप से प्रभावशाली थे।" गेंदा, गुलाब, मोगरा और मौसमी फूलों के हजारों क्विंटल उपयोग से स्वास्तिक, 'ॐ' और मोर जैसे पारंपरिक प्रतीकों के साथ-साथ राव बीकाजी के मूल किले की प्रतीकात्मक नींव को भी फूलों से उकेरा गया।

इस आयोजन में लोटस डेयरी का सहयोग क्षेत्रीय पहचान को संरक्षित करने के लिए सरकारी विभागों, स्थानीय उद्योग और समुदाय के बीच बढ़ते समन्वय का एक बेहतरीन उदाहरण है।


पर्यावरण संरक्षण और संस्कारों का संदेश

हालांकि इस आयोजन का दृश्य प्रभाव अविश्वसनीय था, लेकिन इसके पीछे का मुख्य संदेश पर्यावरण के प्रति जागरूकता था। आज के दौर में जहाँ कृत्रिम रंगों और प्लास्टिक सामग्री का बोलबाला है, देवस्थान विभाग द्वारा "पुष्प" (फूलों) का चयन हरित उत्सव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

श्रीमती ज्योति स्वामी ने कहा, "इस पहल के दो मुख्य उद्देश्य हैं। पहला, 'पुष्प-सेवा' की प्राचीन भारतीय परंपरा को पुनर्जीवित करना। दूसरा, युवा पीढ़ी को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाना। ये फूल उत्सव समाप्त होने के बाद खाद के रूप में उपयोग किए जाएंगे, जिससे वे कचरा बनने के बजाय वापस मिट्टी में मिल जाएंगे।"

इसका सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव भी गहरा रहा। युवाओं को जोड़कर आयोजकों ने पीढ़ीगत अंतर को पाटने का प्रयास किया। 19 वर्षीय प्रतिभागी अनन्या के लिए यह अनुभव बदलावकारी था। उन्होंने कहा, "हमने अक्सर इतिहास की किताबों में बीकानेर का वैभव पढ़ा है, लेकिन आज हमने उसे महसूस किया। ताजी पंखुड़ियों से मंदिर की ज़मीन पर आकृतियाँ उकेरना हमें अपनी मिट्टी से जोड़ता है।"


आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव

इस बड़े आयोजन से स्थानीय फूलों के विक्रेताओं की मांग में भारी उछाल देखा गया, जिससे स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था को लाभ मिला। प्रशासनिक गलियारों में अब 'बीकानेर मॉडल' की चर्चा हो रही है, जिसे जोधपुर और उदयपुर जैसे अन्य विरासत शहरों में भी लागू करने पर विचार किया जा रहा है।

गोपीनाथ जी, धनीनाथ जी, जगन्नाथ जी, शिखरबंद महादेव और नागनेची जी सहित सभी 11 मंदिर एक सांस्कृतिक सर्किट के रूप में उभरे। पूरे दिन मंदिरों में घंटों की गूंज के साथ-साथ पर्यटकों और स्थानीय लोगों की प्रशंसा के शब्द भी सुनाई दिए।


निष्कर्ष

जैसे ही बीकानेर अपने गौरवशाली अस्तित्व के एक और वर्ष में प्रवेश कर रहा है, एक साथ खिले हुए 11 मंदिरों की यह छवि लचीलेपन और सुंदरता का प्रतीक बनकर उभरी है। 538वां स्थापना दिवस केवल भाषणों के लिए नहीं, बल्कि उन गुलाबों की खुशबू के लिए याद किया जाएगा जो सूरज ढलने के बाद भी पुराने शहर की संकरी गलियों में महकती रही।

लक्ष्मीनाथ मंदिर के एक स्थानीय पुजारी के शब्दों में: "राजाओं ने इस शहर को तलवारों से बसाया था, लेकिन आज बीकानेर की बेटियों ने इसे फूलों से सजाकर अपना लिया है।"

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